अनंत चतुर्दशी Anant Chaturdashi
अनंत चतुर्दशी Anant Chaturdashi
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है।
इस दिन श्री हरि विष्णु की अनंत भगवान के रूप में पूजा होती है। भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं बताया हैं की 'अनंत' उनके रूपों में से ही एक रूप है जो काल (समय) का प्रतीक है। इसे विप्पति से उभारने वाला व्रत कहा जाता हैं |
अनन्त-व्रत का महत्व
इस व्रत का विधिपूर्वक पालन करने से सारे पाप नष्ट होते हैं तथा सुख-शांति प्राप्त होती है। अपनी खोई हुई समृद्धि को पुन:प्राप्त किया जा सकता हैं। भगवान श्री हरि विष्णु व्रत करने वाले पर प्रसन्न हाेकर उसे सुख, संपदा, धन-धान्य, यश-वैभव, लक्ष्मी, पुत्र आदि सभी प्रकार के सुख प्रदान करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत करने वाला व्रती यदि विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ भी करे, तो उसकी वांछित मनोकामना की पूर्ति जरूर होती है। पांडवो ने अपने वनवास में इस व्रत का पालन किया था जिसके बाद उनकी विजय हुई थी। इस व्रत का पालन राजा हरिशचन्द्र ने भी किया था और अनंत भगवान के प्रसन्न होने से उन्हें भी अपना राज पाठ वापस मिला था |
अनंत चतुर्दशी इसलिये भी खास होती हैं क्योंकि
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इस दिन देश के कई हिस्सों में गणेश विसर्जन किया जाता हैं | गणेश विसर्जन का पर्व खासतौर पर महाराष्ट्र में मनाया जाता हैं जो पुरे देश में प्रसिद्द हैं |
अनंत चतुर्थी का दिन जैन धर्म के पर्युषण पर्व का अंतिम दिन होता हैं। इस दिन को संवत्सरी के नाम से जाना जाता हैं | इसे क्षमा वाणी भी कहा जाता हैं |
अनन्त सूत्र
अनंत सूत्र रूई या रेशम के कुंकुम से रंगे धागों से राखी के समान ही बना होता हैं। इस सूत्र से सभी कष्टों का निवारण होता हैं | अनन्त सूत्र में चौदह गांठे लगी हुई होती हैं। यह 14 गांठें, 14 लोक को निरूपित करती हैं और इस धागे को व्रती अपने हाथ में बांधते हैं। अनंत चतुदर्शी का व्रत करने वाले पुरुष अनंत सूत्र को अपने दाएं हाथ में बांधते हैं तथा स्त्रियां इसे अपने बाएं हाथ में धारण करती हैं।
अनन्त चतुर्दशी की कथा
अनंत चतुर्दशी पर सामान्यत: भगवान कृष्ण द्वारा युधिष्ठिर से कही गई कौण्डिल्य एवं उसकी स्त्री शीला की कथा सुनाई जाती है।
अनंत चतुर्दशी व्रत की कहानी भगवान कृष्ण ने पांडवो से भी कही थी जिसके कारण पांडवो ने अपने वनवास में इस व्रत का पालन किया था जिसके बाद उनकी विजय हुई थी |
पौराणिक युग में सुमंत नाम का एक ब्राहमण था जो बहुत विद्वान था उसकी पत्नी भी धार्मिक स्त्री थी जिसका नाम दीक्षा था | सुमंत और दीक्षा की एक संस्कारी पुत्री थी जिसका नाम सुशीला था | सुशीला के बड़े होते होते उसकी माँ दीक्षा की मृत्यु हो गई। पत्नी के मरने के बाद सुशीला की परवरिश को ध्यान में रखते हुए सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया। सौतेली माता कर्कशा, सुमंत की पुत्री शीला को पसन्द नहीं करती थी और उसे तरह-तरह की तकलीफें दिया करती थी।
कुछ समय बाद जब सुशीला विवाह योग्य हुई तो उसका विवाह कौण्डिन्य ऋषि के साथ कर दिया। कौण्डिन्य ऋषि और सुशीला अपने माता पिता के साथ उसी आश्रम में रहने लगे | माता कर्कशा का स्वभाव अच्छा ना होने के कारण सुशीला और उनके पति कौण्डिन्य को आश्रम छोड़ कर जाना पड़ा |
कौंडिन्य अपनी पत्नी शीला को लेकर अपने आश्रम की ओर चल दिए परंतु रास्ते में ही रात हो गई, इसलिए वे एक नदी तट पर रूक कर संध्या पाठ करने लगे और रात्रि का विश्राम किया | उसी दौरान सुशीला ने देखा वहाँ कई स्त्रियाँ सुंदर सज कर पूजा कर रही थी और एक दुसरे को रक्षा सूत्र बाँध रही थी | सुशीला ने उसने उस व्रत का महत्व पूछा | वे सभी अनंत देव की पूजा कर रही थी और उनका रक्षा सूत्र जिसे अनंत सूत्र कहते हैं वो एक दुसरे को बाँध रही थी जिसके प्रभाव से सभी कष्ट दूर होते हैं और व्यक्ति के मन की इच्छा पूरी होती हैं | सुशीला ने व्रत का पूरा विधान सुनकर उसका पालन किया और विधि विधान से पूजन कर अपने हाथ में अनंत सूत्र धारण किया और अनंत देव से अपने पति के सभी कष्ट दूर करने की प्रार्थना की |
समय बीतने लगा ऋषि कौण्डिन्य और सुशीला का जीवन सुधरने लगा | अनंत देव की कृपा से धन धान्य की कोई कमी ना थी |
अगले वर्ष फिर से अनंत चतुर्दशी का दिन आया | सुशीला ने भगवान को धन्यवाद देने हेतु फिर से पूजा की और सूत्र धारण किया |नदी तट से वापस आई | ऋषि कौण्डिन्य ने हाथ में बने सूत्र के बारे में पूछा तब सुशीला ने पूरी बात बताई और कहा कि यह सभी सुख भगवान अनंत के कारण मिले हैं | यह सुनकर ऋषि को क्रोध आ गया उन्हें लगा कि सुशीला कोई ऐसा डाेरा बांध कर उसे अपने वश में करना चाहती है, इसलिए उन्होंने उस अनंत डोरे (सूत्र) को तोड़ कर अग्नि में डाल दिया | इस तरह से अपमान के कारण अनंत देव रुष्ठ हो गए और धीरे- धीरे ऋषि कौण्डिन्य के सारे सुख, दुःख में बदल गए और वो वन- वन भटकने को मजबूर हो गए | तब उन्हें एक प्रतापी ऋषि मिले जिसने उन्हें बताया कि यह सब भगवान के अपमान के कारण हुआ हैं | तब ऋषि कौण्डिन्य को उनके पाप का आभास हुआ और उन्होंने विधि विधान से अपनी पत्नी के साथ अनंत देव का पूजन एवम व्रत किया | इस व्रत को उन्होंने कई वर्षो तक किया जिसके 14 वर्ष बाद अनंत देव प्रसन्न हुये और उन्होंने ऋषि कौण्डिन्य को क्षमा कर उन्हें दर्शन दिये जिसके फलस्वरूप ऋषि कौण्डिन्य और उनकी पत्नी के जीवन में पुनः सुखः सम्पति की प्राप्ति हुई थी |
अनंत चतुर्दशी व्रत का पालन कैसे करें :-
इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान किया जाता हैं |
कलश की स्थापना की जाती हैं जिसमे कमल का पुष्प रखा जाता हैं और कुषा का सूत्र चढ़ाया जाता हैं |
भगवान एवम कलश को कुम कुम, हल्दी का रंग चढ़ाया जाता हैं |
हल्दी से कुषा के सूत्र को रंगा जाता हैं |
अनंत देव का आव्हान कर उन्हें दीप, दूप एवम भोग लगाते हैं |
इस दिन भोजन में खीर पूरी बनाई जाती हैं |
पूजा के बाद सभी को अनंत सूत्र बाँधा जाता हैं |
इस प्रकार इस व्रत का पालन करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं |

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