दाधीच जंयती Dadhich jayanti
दाधीच जंयती
प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की शुक्ल अष्टमी को दाधीच जंयती मनाई जाती है। यूँ तो इतिहास में कई दानी हुए हैं, किंतु मानव कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान करने वाले मात्र महर्षि दधीचि ही थे।
दाधीच का परिचय
दधीचि प्राचीन काल के परम तपस्वी और ख्यातिप्राप्त महर्षि थे। महर्षि दधीची
के पिता महान ऋषि अथर्वा जी थे और इनकी माता का नाम शान्ति था।ऋषि दधीचि जी ने अपना संपूर्ण जीवन भगवान शिव की भक्ति में व्यतीत किया था। उन्होंने कठोर तप द्वारा अपने शरीर को कठोर बना लिया था। उनकी पत्नी का नाम 'गभस्तिनी' था।
दधीचि की कथा
एक बार वृत्रासुर नामक राक्षस के भय से इन्द्र अपना सिंहासन छोड़कर देवताओं के साथ मारे-मारे फिरने लगते हैं। क्योंकि इंद्र के द्वारा किये गए किसी भी कठोर-अस्त्र-शस्त्रों का प्रभाव वृत्रासुर पर नहीं पड़ रहा था तथा समस्त देवताओं के द्वारा चलाये गये अस्त्र-शस्त्र भी उस दैत्य के सामने व्यर्थ हो गये थे। अपनी इस व्यथा को लेकर वे ब्रह्मा जी के पास जाते हैं तो ब्रह्मा जी उन्हें ऋषि दधीचि के पास जाने की सलाह देते हैं। ब्रह्मा जी कहते है कि इस संकट समय़ केवल दधीचि ही उनकी सहायता कर सकते हैं। यदि वे अपनी अस्थियो को दान में देते है तो उनकी अस्थियो से बने शस्त्रों से वृत्रासुर मारा जा सकता है। क्योंकि महर्षि दधीचि की अस्थियों मे ब्रहम्म तेज था जिससे वृत्रासुर राक्षस मारा जा सकता था।
महर्षि दधीचि द्वारा वज्र निर्माण हेतु हड्डियो का दान
जब इंद्र देव ब्रह्मा जी के कहे अनुसार महर्षि दधीचि के पास जाते हैं। इंद्र देव महर्षि दधीचि से प्रार्थना करते हुए उनसे उनकी हड्डियाँ दान स्वरुप मांगते हैं। महर्षि दधीचि ने जब इंद्र देव और अन्य देवताओं के मुख से यह सुना की मात्र दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र द्वारा ही असुरों का संहार किया जा सकता है। तब महर्षि दधीचि ने अपना शरीर त्याग कर अस्थियों का दान कर देते हैं। इस तरह अपनी हड्डियो को दान में देकर देवताओं की रक्षा करते हैं। महर्षि दधीचि निस्वार्थ भाव से लोकहित के लिए अपने शरीर का त्याग कर देते हैं।
इसलिए कहा गया है की यूँ तो इतिहास में कई दानी हुए हैं, किंतु मानव कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान करने वाले मात्र महर्षि दधीचि ही थे।
महर्षि दधीचि की हड्डियों से वज्र का निर्माण होता है और उसी वज्र द्वारा इंद्र देव ने वृत्रासुर का अंत किया था। इस प्रकार परोपकारी ऋषि दधीचि के त्याग द्वारा तीनों लोकों की रक्षा होती है और इंद्र को उनका स्थान पुन: प्राप्त होता है।
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