वामन जयंती Vaman Jayanti
वामन जयंती Vaman Jayanti
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को वामन जयंती मनाई जाती है। द्वादशी तिथि होने के कारण इसे 'वामन द्वादशी' भी कहा जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार द्वादशी तिथि को श्रवण नक्षत्र के अभिजित मुहूर्त में भगवान श्रीविष्णु ने जनकल्याण के लिए वामन अवतार लिया था।
वामन अवतार की कथा Vaman avtar ki Katha
1.विष्णु का वामन अवतार
जब राजा इन्द्र को यह ज्ञात होता है कि दैत्यराज बलि सौ यज्ञ पूरे करने के बाद स्वर्ग को जितने में सक्षम हो जायेगा। तब वे भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं। भगवान श्री हरि विष्णु वचन देते हैं की वे स्वयं वामन अवतार के रूप में माता अदिति के गर्भ से जन्म लेंगे और उनकी रक्षा करेंगे । माता अदिति पयोव्रत अनुष्ठान (पुत्र प्राप्ति के लिए) करती हैं, तब श्री हरि विष्णु भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन माता अदिति के गर्भ से प्रकट हो कर अवतार लेते हैं तथा ब्रह्मचारी ब्राह्मण का रूप धारण करते हैं। महर्षि कश्यप उनका उपनयन संस्कार करते हैं। तत्पश्चात भगवान वामन पिता से आज्ञा लेकर बलि के पास जाते हैं। उस समय राजा बलि नर्मदा के उत्तर-तट पर अन्तिम सौ वॉ यज्ञ कर रहे होते हैं।2.बलि द्वारा भूमिदान
वामन अवतारी श्रीहरि, राजा बलि के यहाँ भिक्षा माँगने पहुँचते हैं। ब्राह्मण बने विष्णु राजा बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि माँगते हैं। राजा बलि दैत्यगुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी अपने वचन पर अडिग रहते हुए, वामन को तीन पग भूमि दान में देने का वचन देते हैं। वामन रूप में भगवान एक पग में स्वर्गादि उर्ध्व लोकों को नाप लेते हैं। फिर दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लेते हैं। अब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहता हैं। बलि के सामने संकट उत्पन्न हो जाता है कि वामन के तीसरे पैर को रखने के लिए स्थान कहाँ से लाये। ऐसे में राजा बलि यदि अपना वचन नहीं निभाए तो अधर्म होगा। आखिरकार बलि अपना सिर भगवान के आगे कर देता है और कहता है तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए। वामन भगवान ठीक वैसा ही करते हैं और बलि को पाताल लोक में रहने का आदेश करते हैं। बलि सहर्ष आदेश को स्वीकार करता है।
3.श्री हरि विष्णु का बलि का द्वारपाल बनना
बलि के द्वारा वचन पालन करने पर भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और दैत्यराज बलि को वर माँगने को कहते हैं। इसके बदले में बलि रात-दिन भगवान को अपने सामने रहने का वचन माँग लेता है, श्रीविष्णु अपना वचन का पालन करते हुए पाताल लोक में राजा बलि का द्वारपाल बनना स्वीकार करते हैं।
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