वाराह अवतार Varah avtaar
वाराह अवतार Varah avtaar
वाराह अवतार भगवान श्रीहरि विष्णु का ही उनके लिए गए दस अवतारों में से एक अवतार रूप है।
वाराह जयंती varah jyanti
भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को वाराह जयंती मनाई जाती हैं।
वाराह अवतार की कथा varah avtaar ki katha
प्राचीन काल में एक बार पूरी पुथ्वी हिल उठी थी क्योंकि एक साथ दो राक्षसों ने दिति के गर्भ
से जुड़वां बच्चों रूप में जन्म लिया जिनके नाम हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु थे। वे संपूर्ण संसार पर विजय हासिल करना चाहते थे और अजेय व अमर बनाना चाहते थे। इसलिए हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों ने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया इनकी तपस्या से प्रसन्न हो ब्रह्मा जी ने इन्हें वरदान मांगने को कहा, दोनों भाइयों ने वरदान में यह मांगा कि "हे प्रभु कोई भी युद्ध में हमें पराजित न कर सके और न कोई मार सके यानि उन्होंने अजर व् अमर होने का वरदान माँगा ।" ब्रह्माजी वरदान देकर भक्त को प्रसन्न कर देते हैं। ब्रह्मा जी से वरदान पाकर हिरण्याक्ष और भी अधिक उद्दंड और निरंकुश बन जाता हैं, तीनों लोकों में अनेक अत्याचार करने लगता हैं। उसके भय से इंद्रदेव स्वर्ग से भाग जाते हैं। अब वह स्वयं को विष्णु भगवान से भी बड़ा समझने लगा था। वह विष्णु भगवान की खोज में समुंद्र के अंदर जाता हैं तो उसे एक वाराह दिखाई देता हैं जो अपने दाँतो पर पुथ्वी को उठाये ऊपर की ओर ले जा रहा होता हैं। हिरण्याक्ष वाराह रूपी भगवान से कहता है की "धरती तो दैत्यों के उपभोग की वस्तु है। इसे कहाँ लेकर जा रहे हो?"
हिरण्याक्ष वाराह रूपी भगवान को जाने से रोकने की कोशिश करता हैं और भला बुरा कहता हैं। हिरण्याक्ष की कटु वाणी को अनसुना करते हुए भगवान विष्णु शांत रूप से दांतों पर धरती को लिए हुए आगे बढ़ते रहते हैं और वे पृथ्वी को रसातल से बाहर निकलकर समुद्र के ऊपर स्थापित कर देते हैं।
वाराह पर अपनी बातों का असर न होता देख हिरण्याक्ष हाथ में गदा लेकर वाराह रूपी भगवान विष्णु पर प्रहार करता है तब भगवान हिरण्याक्ष के हाथ से गदा छीनकर उसे दूर फेंक देते हैं। अब हिरण्याक्ष त्रिशूल से भगवान विष्णु को मारने का प्रयास करता है। लेकिन शीघ्र ही भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र द्वारा हिरण्याक्ष के त्रिशूल के टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं। वाराह रूपी भगवान और हिरण्याक्ष मे मध्य भयंकर युद्ध होता है और अन्त में वाराह रूपी विष्णु भगवान के हाथों से हिरण्याक्ष का वध होता है।
वाराह जयंती की व्रत विधी Varaha Jayanti vart vidhi
1.व्रत रखने वाले वर्ती को संकल्प करके एक कलश में भगवान वराह की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।
2.भगवान की स्थापना करने के पश्चात विधि विधान सहित षोडषोपचार से भगवान वराह की पूजा करनी चाहिए।
3.पूरे दिन व्रत रखना चाहिए।
4.रात्रि में जगारण करना चाहिए।
5.भगवान विष्णु के अवतारों की कथाएँ सुननी चाहिए।
6.अगले दिन त्रयोदशी के दिन कलश मे स्थित वराह भगवान की पूजा करने के बाद विसर्जन करना चाहिए।
7.विसर्जन के पश्चात प्रतिमा को दान कर देना चाहिए।
वराह मंत्र Varaha Mantra
जिसका वर्ती को जाप करना चाहिए:-ॐ वराहाय नमः
ॐ सूकराय नमः
ॐ धृतसूकररूपकेशवाय नमः
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