डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन Dr S Radhakrishnan
डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के द्वितीय राष्ट्रपति और भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति के पद पर रहे थे। वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक होने के साथ महान् हिन्दू विचारक थे। उनके इन्हीं गुणों के कारण सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया था। उनका जन्मदिन 5 सितम्बर को भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म दक्षिण भारत के तिरुत्तनि
( चेन्नई से पास 64 किमी दूर उत्तर-पूर्व में है) में हुआ था। उन्होंने अपना जन्म दिन अपने व्यक्तिगत नाम से नहीं अपितु सम्पूर्ण शिक्षक बिरादरी को सम्मानित किये जाने के उद्देश्य से शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की इच्छा व्यक्त की थी जिसके परिणामस्वरूप आज हमारे देश में उनका जन्म दिन (5 सितम्बर) को प्रति वर्ष शिक्षक दिवस के नाम से ही मनाया जाता है।
डॉ॰ राधाकृष्णन समस्त विश्व को एक शिक्षालय मानते थे। उनकी मान्यता थी कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जाना सम्भव है। इसीलिए समस्त विश्व को एक इकाई समझकर ही शिक्षा का प्रबन्धन होना चाहिये।
17 अप्रैल, 1975 को सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लंबी बीमारी के बाद अपना देह त्याग दिया।
डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के द्वितीय राष्ट्रपति और भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति के पद पर रहे थे। वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक होने के साथ महान् हिन्दू विचारक थे। उनके इन्हीं गुणों के कारण सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया था। उनका जन्मदिन 5 सितम्बर को भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म दक्षिण भारत के तिरुत्तनि
( चेन्नई से पास 64 किमी दूर उत्तर-पूर्व में है) में हुआ था। उन्होंने अपना जन्म दिन अपने व्यक्तिगत नाम से नहीं अपितु सम्पूर्ण शिक्षक बिरादरी को सम्मानित किये जाने के उद्देश्य से शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की इच्छा व्यक्त की थी जिसके परिणामस्वरूप आज हमारे देश में उनका जन्म दिन (5 सितम्बर) को प्रति वर्ष शिक्षक दिवस के नाम से ही मनाया जाता है।
डॉ॰ राधाकृष्णन समस्त विश्व को एक शिक्षालय मानते थे। उनकी मान्यता थी कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जाना सम्भव है। इसीलिए समस्त विश्व को एक इकाई समझकर ही शिक्षा का प्रबन्धन होना चाहिये।
17 अप्रैल, 1975 को सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लंबी बीमारी के बाद अपना देह त्याग दिया।
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