पापांकुशा एकादशी
पापांकुशा एकादशी
आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापाकुंशा एकादशी कहते हैं। इस एकादशी पर भगवान 'पद्मनाभ' की पूजा की जाती है। इस दिन मौन रहकर भगवान का स्मरण किया जाता है।
पापाकुंशा का अर्थ
पापों को हाथी के सामान माना गया हैं। इस पापरूपी हाथी को
इस व्रत के पुण्य से वेधा जा सकता हैं। इसका नाम ही यह बताता हैं की यह एकादशी पाप का नाश करती हैं।
इस व्रत के पुण्य से वेधा जा सकता हैं। इसका नाम ही यह बताता हैं की यह एकादशी पाप का नाश करती हैं।
महत्त्व
इस एकादशी के व्रत रखने से भगवान व्रति के समस्त पापों का नाश कर देते हैं। अर्थात यह एकादशी पापों का नाश करने वाली कही गई है। जनहितकारी निर्माण कार्य प्रारम्भ करने के लिए यह एक उत्तम मुहूर्त है। इस एकादशी का महत्त्व स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था की जो इस पापांकुश एकदशी का व्रत रखते हैं वे भक्त कमल के समान होते हैं जो संसार रूपी माया के पंक में भी पाप से अछूता रहते है। जो व्यक्ति यह व्रत करता है उसके सारे संचित पाप नष्ट हो जाते हैं।
व्रत विधि
इस एकादशी व्रत का नियम पालन दशमी तिथि की रात्रि से ही शुरू करना चाहिए तथा ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन सुबह नित्य कर्मों से निवृत्त होकर साफ वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु की शेषशय्या पर विराजित प्रतिमा के सामने बैठकर व्रत का संकल्प लें। इस दिन यथा संभव उपवास करें। उपवास में अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। संभव न हो तो व्रती एक समय फलाहार कर सकता है। इसके बाद भगवान 'पद्मनाभ' की पूजा विधि-विधान से करनी चाहिए।
भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराना चाहिए। स्नान के बाद उनके चरणामृत को व्रती अपने और परिवार के सभी सदस्यों के अंगों पर छिड़के और उस चरणामृत का पान करे। इसके बाद भगवान को गंध, पुष्प, धूप, दीपक, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री अर्पित करें। 'विष्णु सहस्त्रनाम' का जाप करें एवं उनकी कथा सुनें। रात्रि को भगवान विष्णु की मूर्ति के समीप हो शयन करना चाहिए और दूसरे दिन यानी द्वादशी के दिन वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देकर आशीर्वाद प्राप्त लेना चाहिए। इस प्रकार पापांकुशा एकादशी का व्रत करने से दिव्य फलों की प्राप्ति होती है।
कथा
प्राचीन काल में विंध्य पर्वत पर 'क्रोधन' नामक एक महाक्रूर बहेलिया रहता था। उसने अपनी सारी ज़िंदगी, हिंसा, लूट-पाट, मद्यपान तथा मिथ्या भाषण आदि में व्यतीत कर दी। जब जीवन का अंतिम समय आया, तब यमराज ने अपने दूतों से कहा कि वे क्रोधन को ले आयें। यमदूतों ने क्रोधन को बता दिया कि कल तेरा अंतिम दिन है। मृत्यु के भय से भयभीत वह बहेलिया महर्षि अंगिरा की शरण में उनके आश्रम जा पहुँचा। महर्षि ने उसके अनुनय-विनय से प्रसन्न होकर उस पर कृपा करके उसे अगले दिन ही आने वाली आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी का विधि पूर्वक व्रत करने को कहा। इस प्रकार वह पापांकुशा एकादशी का व्रत-पूजन कर भगवान की कृपा से पाप मुक्त हो गया और उसे विष्णु लोक प्राप्त हो गया। उधर यमदूत इस चमत्कार को देख हाथ मलते रह गए और बिना क्रोधन को लिये यमलोक वापस लौट गए।

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