जानें भगवान् कृष्ण की रास पूर्णिमा का राज ? इस दिन रात को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता हैं ? इस दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से होता है परिपूर्ण ?
शरद पूर्णिमा / कोजागर व्रत
शरद पूर्णिमा का महत्व
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पूरे साल में केवल इसी दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है।
इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने महा रास रचाया था। मान्यता है इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। तभी इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चाँदनी में रखने का विधान है। इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के अत्यंत समीप होता है। कार्तिक का व्रत भी शरद पूर्णिमा से ही प्रारम्भ होता है।कोजागर व्रत का महत्व
यह व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला होता है। इस व्रत से प्रसन्न होकर माँ लक्ष्मी इस जीवन में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।
कोजागर व्रत की विधि
इस दिन व्रति विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे। व्रत रखने वाला व्यक्ति ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए १०० दीपक जलाए। इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। एक प्रहर जो की 3 घंटे का होता हैं उसके बीत जाने के बाद लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें। तत्पश्चात भक्तिपूर्वक सात्विक ब्राह्मणों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। तदनंतर सूर्योदय के समय में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्य को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और देखती हे की जो भक्त रात्रि में जागकर उनकी पूजा में लगा हुआ है उन्हें वह वर और अभय प्रदान करती हैं।
कोजागर व्रत की कथा
एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी। दोनो पुत्रियाँ पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री को जो संतान होती थी वो सन्तान पैदा होते ही मर जाती थी।
उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है। उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया।
उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से पकडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा। बडी बहन बोली-" तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।" तब छोटी बहन बोली, " यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। "
उसके बाद नगर में उसने पुर्णिमा का व्रत पूरा करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।


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